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Tuesday, September 16, 2008

स्वमत-प्रकाश

जो नारी
नत होकर,
सम्मान सहित
अपना मत प्रकाश करती है--
एवं
उस विषय में
किसी को भी
हीन नहीं बनाती,
वह --
सहज ही
आदरणीया एवं पूजनीया होती है । 15

कतिपय महत्-गुण

आदर्श में अनुप्राणता,
सेवा में दक्षता,
कार्य में निपुणता,
बातों में मधुरता और सहानुभूति,
व्यवहार में संवर्द्धना --
ये सभी महद् गुण हैं । 14

संतोष में सुख

अपने प्रयोजन को न बढ़ाकर
मान-यश की आकांक्षा किये वगैर,
सेवा-तत्पर रहकर
सर्वदा संतुष्ट रहने के भाव को
चरित्रगत कर लो ; --
सुख तुम्हें
किसी तरह नहीं छोड़ेगा । 13

परिजन में व्याप्ति

यदि यशस्विनी बनना चाहती हो--
अपने निजस्व और वैशिष्ट्य में अटूट रहकर
पारिपार्श्विक के जीवन और वृद्धि को
अपनी सेवा और साहचर्य से
उन्नति की दिशा में
मुक्त कर दो
तुम प्रत्येक की पूजनीया और नित्य प्रयोजनीया होकर
परिजन में व्याप्त होओ --
और ये सभी तुम्हारे
स्वाभाविक
या
चरित्रगत हों । 12

चाह की विलासिता

जभी देखो-
तुम्हारे
वाक्, व्यवहार, चलन, चरित्र और लगे रहना
तुम्हारी चाह को
जिस प्रकार परिपूरित कर सकते हैं--
उसे सहज रूप से अनुसरण नहीं कर रहे हैं; --
निश्चय जानो --
तुम्हारी चाह खांटी नहीं है--
चाह की केवल विलासिता है । 11

Sunday, September 14, 2008

भाव, भाषा और कर्म

भाव
भाषा को मुखर कर देता है —
पुनः भाव ही कर्म को नियंत्रित करता है,
और, भावना से ही भाव उदित होता है;
अतएव
अपनी भावना को
जितने सुंदर, सुश्रृंखल, सहज, अविरोध
एवं उन्नत ढंग की बनाओगी —
तुम्हारी भाषा, व्यवहार, और कर्मकुशलता भी
उतनी
सुंदर अविरोध और उन्नत ढंग की होगी ! 10

दान और प्राप्ति

तुम्हारे भाव, भाषा और कर्मकुशलता जिस प्रकार होगी
तुम्हारे संसर्ग में जो ही आयेंगे
उसी प्रकार वे उद्दीप्त होंगे,
और, तुम पाओगी भी वही —
उसी प्रकार ;
तुम नारी हो,
प्रकृति ने ही तुम्हें
वैसी गुणमयी बनाकर
प्रसव किया है —
समझकर चलो ! 9

नारीत्व का अपलाप

स्मरण रखो —
तुम्हारा संसर्ग यदि
सभी विषयों में
यथायथ भाव से
उन्नति या वृद्धि की दिशा में
परिचालित नहीं करे —
तो तुम्हारा नारीत्व क्या
मसीलिप्त नही हुआ? 8

धर्मकार्य

धर्मकार्य का अर्थ है
वही करना —
जिससे
तुम्हारा और तुम्हारे पारिपार्श्विक का
जीवन, यश और वृद्धि
क्रमवर्द्धन से वर्द्धित हो ;-
सोच, समझ, देख, सुनकर —
वही बोलो, --
और आचरण में
उसका ही अनुष्ठान करो,--
देखोगी —
भय और अशुभ से कितना त्राण पाती हो। 7

कुमारीत्व

कुमारी कन्याओं का —
पिता के प्रति अनुरक्ति रहना,
उनकी सेवा और साहचर्य करना —
उनके साथ
वार्तालाप करना —
उन्नति का प्रथम और पुष्ट सोपान है। 6

Friday, September 12, 2008

नारी का वैशिष्ट्य

नारियों के वैशिष्ट्य में है--
निष्ठा, धर्म, शुश्रूषा, सेवा, सहायता,
संरक्षण, प्रेरणा और प्रजनन,
तुम अपने इन वैशिष्ठ्यों में
किसी एक का भी
त्याग न करो ;
इसे खोने पर
तुमलोगों का
और बचा ही क्या ? 5

सुख और भोग

सुख का अर्थ वही है
जो being को (सत्ता या जीवन को)
सुस्थ, सजीव और उन्नत कर
पारिपार्श्विक को उस प्रकार बना दे, --
और प्रकृत भोग
तभी वहाँ उसे
अभिनंदित करता है। 4

क्षिप्रता और दक्षता

क्षिप्रता सहित दक्षता को साध लो,
और नजर रखो भी-
मनुष्य के प्रयोजनानुसार
हावभाव पर ;
और हावभाव को देखकर ही
जिससे
प्रयोजन को अनुधावन कर सको-
अपने बोध को इसी प्रकार तीक्ष्ण बनाने की
चेष्टा करो ;
इसी प्रकार ही--
क्षिप्रता और दक्षता सहित--
मनुष्य के प्रयोजन को
अनुधावन कर
सेवा-तत्पर बनो,--
देखोगी--
सेवा का जयगान
तुम्हें परिप्लुत कर देगा। 3

सेवा और सेवा का अपलाप

"सेवा" का अर्थ वही है
जो मनुष्य को
सुस्थ, स्वस्थ, उन्नत और आनंदित कर दे;
जहाँ ऐसा न हो
परन्तु शुश्रूषा है-
वह सेवा अपलाप को आवाहन करती है। 2

कन्या मेरी !

तुम्हारी सेवा, तुम्हारा चलन
तुम्हारी चिंता, तुम्हारी कथनी,
पुरूष-जनसाधारण में
ऐसा एक भाव पैदा कर दे-
जिससे वे नतमस्तक,
नतजानु हो,
ससम्भ्रम,
भक्तिगदगद कंठ से --
"माँ मेरी, जननी मेरी!" कहते हुए
मुग्ध हों, बुद्ध हों, तृप्त हों,
कृतार्थ हों, --
तभी तो तुम कन्या हो,
--तभी तो तुम हो सती !

माँ की तरह

तुम मनुष्य की
माँ जैसा अपना बनने की
चेष्टा करो--
कथनी, सेवा और भरोसा से
किंतु घुलमिलकर नहीं
देखोगी --
कितने तुम्हारे अपने बनते जा रहे हैं। 1